Header Ads

निरन्तर आत्मनिरीक्षण करें ! Constantly introspect.

निरन्तर आत्मनिरीक्षण करें !

निरीक्षण का अर्थ है देखना, गौर से देखना, जांच-पड़ताल करना या निगरानी करना। और, आत्मनिरीक्षण का मतलब है, स्वयं अपने आपको देखना, खुद अपनी जांच-पड़ताल करना या स्वयं अपनी निगरानी करना।

यह मानव स्वभाव है कि वह दूसरों के आचार-व्यवहार की खूब जांच-पड़ताल करता है तथा उनकी कमियों का बड़ी बारीकी से अध्ययन करता है। और, अगर कोई कमी दिखाई दे गई, तो चटखारे ले-लेकर उसे जगह-जगह कहता फिरता है। इसमें उसे बड़े सुख की अनुभूति होती है। इस सबका उद्देश्य होता है अपने आपको श्रेष्ठ दर्शाना।

इसके विपरीत, मनुष्य को स्वयं अपनी कमियां कभी भी दिखाई नहीं देतीं। यदि दिखाई देती भी हैं, तो वह उन्हें बड़ी जल्दी उचित सिद्ध कर लेता है। यह स्वयं के साथ बेईमानी है। यह तो हुई एक सामान्य मनुष्य की बात, किन्तु जो व्यक्ति साधना में लगा हुआ है, उसे इस पक्ष में बहुत ही सतर्क एवं सजग रहने की आवश्यकता है। 

साधक को तो निरन्तर अपने आपको ही देखना है। वह क्या कर रहा है? कहां जा रहा है? उसका लक्ष्य क्या है? वह कहीं गिर तो नहीं रहा है? भटक तो नहीं रहा है? रुक तो नहीं रहा है? या विपरीत दिशा में तो नहीं जा रहा है? आदि-आदि। यह सब उसे बड़ी ईमानदारी के साथ देखना चाहिए।

इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि साधक आंख मूंदकर अपनी साधना किये जाय। उसे खोजी प्रवृत्ति का होना चाहिए। जहां-कहीं भी अनीति-अन्याय-अधर्म हो रहा हो, उसे खुली आंखों से देखना चाहिए और खुलकर उसका प्रतिकार करना चाहिए। उसके विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए तथा आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष भी करना चाहिए।

साधक को सबसे पहले अपने जीवन की गति को मोड़ना चाहिए, अर्थात् विषयाभिमुख जीवन को परमसत्ता माता भगवती की ओर मोड़ना चाहिए। नारद सूत्रों के अनुसार, विषय सबसे पहले लहर की भांति मन में आते हैं। यदि उन्हें आश्रय दे दिया जाय, तो वे समुद्र बन जाते हैं। अतः उसके लिए देखने की पहली बात यह है कि उसका मन विषयों की ओर जा रहा है या माता आदिशक्ति जगज्जननी जगदम्बा की ओर? यदि उसका मन विषयों से हटकर बार-बार ‘माँ’-गुरुवर के चरणों की ओर जाय, तो समझना चाहिए कि वह उन्नति की ओर जा रहा है। विषयों की ओर जाने का न जाने कितने जन्मों का अभ्यास है, किन्तु उसकी नीयत अच्छी है। इसीलिए वह बार-बार परमसत्ता की ओर जाता है। तब वह ठीक रास्ते पर जा रहा है।

साधक के जीवन की दिशा यदि भोग की ओर है, तो वह सही मार्ग पर नहीं है। अगर भोगों से विरक्ति होना शुरू होजाय और माता भगवती एवं उनके विषय में अनुरक्ति बढ़ने लगे, तो उन्नति की ओर अग्रसर होने की यह सीधी पहचान है। साधक को स्वयं अपने मन में देखना चाहिए कि यदि उसकी वृत्तियां विषयों की ओर अधिक बढ़ रही हैं, तो समझना चाहिए कि वह विषयजगत् में ही रह रहा है, भले ही वह किसी मन्दिर में है, अपने घर पर है या किसी आश्रम में है।

ऐसी स्थिति में साधक को चाहिए कि वह अपने मन की मलिनता को दूर करे। अपने मनमन्दिर में झाड़-बुहार करके उसे साफ करे और उसके अन्दर जमा कूड़े-कचरे को बाहर फेंके। उसे चाहिए कि वह अपने मन को निरन्तर इस कसौटी पर कसता रहे कि उसका अनुराग ‘माँ’ के चरणों की ओर बढ़ रहा है या नहीं। यदि भोगों को तिलांजलि नहीं देंगे और सांसारिक बन्धनों में जकड़े रहेंगे, तो आगे कैसे बढ़ेंगे?

एक बार कुछ नाविकों को नाव के द्वारा कुछ सामान वाराणसी से इलाहाबाद पहुंचाना था। गर्मी का मौसम था और चांदनी रात थी। उन्होंने सामान नाव पर लादा और चल पड़े इलाहाबाद की ओर। पतवार चलाने में थकान महसूस न हो, इसके लिए उन्होंने भांग पी रखी थी। नाव खेते-खेते पूरी रात बीत गई, सवेरा हुआ, भांग का नशा उतरा, तो देखा कि नाव तो जहां की तहां खड़ी है। बाद में देखा गया कि उन्होंने नाव का वह रस्सा ही नहीं खोला था, जिसके द्वारा वह किनारे से बंधी थी। इसी प्रकार, सांसारिक भोगों में बंधे रहकर जो भी साधन किया जाता है, वह साधन होता ही नहीं है। वह तो खूंटे से बंधी नाव के पतवार खेने के जैसा होता है। इससे कुछ भी हाथ नहीं लगता। साधना करते-करते उम्र बीत जाती है, किन्तु उससे कुछ भी प्राप्त नहीं होता, क्योंकि रस्सा तो वहीं बंधा है। माता रानी की साधना में बैठे हैं, किन्तु मन विषयभोगों में घूम रहा है।

अतः साधक के लिए निरन्तर यह देखते रहना ज़रूरी है कि उसका जीवन भोगपरायण है या भगवत्यरामण? भोगों के पास आने से उसे उन्हें फटकार देना चाहिए।

साधक को दो बातों से विशेष सतर्क रहने की जरूरत है-- प्रमाद और कुसंग। साधना में कभी भी कोई भूलचूक या लापरवाही नहीं होनी चाहिए। वह नियमित रूप से, पूर्ण मनोयोग से और निष्ठापूर्वक होगी, तभी फलीभूत होगी। कभी मन हुआ, तो कर ली और न हुआ, तो नहीं की--इससे साधना में ठहराव आएगा और अन्ततः वह छूट जाएगी। इसके अतिरिक्त, बुरी संगत से हमेशा बचना है। अच्छे-अच्छे आगे बढ़े हुए साधक भी बुरी संगत में पड़कर साधना से विमुख होते देखे गए हैं। ऐसे में गुरु का आश्रय करना हितकर होता है। उनके निर्देशन और मार्गदर्शन में साधना करेंगे, तो यात्रा निर्विघ्न चलेगी। यदि सदगुरु का आश्रय न हो, तो व्यक्ति कुछ दिन बाद साधन से गिर सकता है।

इसलिए साधक को निरन्तर अपने अर्न्तमन को देखते रहना चाहिए। बाहर नहीं, भीतर झांककर देखना चाहिए। यदि उसके दोष घटने की बजाय बढ़ रहे हैं, तो समझना चाहिए कि वह ठीक मार्ग पर नहीं है। यदि दोष घट रहे हैं, भोगों से विरक्ति बढ़ रही है और परमसत्ता से अनुराग बढ़ रहा है, उसकी स्मृति में आनन्द बढ़ रहा है, उसकी ओर जाने में शान्ति की अनुभूति होने लगी है, तो समझना चाहिए कि वह सही रास्ते पर चल रहा है। यदि कहीं पर कोई भूल हुई हो, तो तुरन्त पश्चात्ताप करके उसे सुधारना चाहिए।

साधक बनने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि उसके अन्दर ऐसा होने का अभिमान आजाय। साधना के मार्ग में यह भी एक बहुत बड़ी बाधा है। जहां साधना का अभिमान आया, वहां पर साधक दूसरों को तुच्छ समझने लगता है। उसके लिए जाति-धर्म, विद्या, धन और ज्ञान का अभिमान उसकी साधना के मार्ग में बड़े अवरोध हैं। उसे दूसरे को नीचा नहीं मानना चाहिए और न ही उसके दोष देखने चाहिएं। उसे तो लगातार अपनी गलतियों को देखकर उन्हें रात-दिन सुधारने में लगे रहना चाहिए।

साधक को दिन-रात बड़ी सावधानी के साथ परमसत्ता माता भगवती के चरणों से जुड़े रहना चाहिए। यदि कभी उल्टे रास्ते पर आजाय, तो दृढ़ता के साथ स्वयं को ठीक करके सही मार्ग पर आजाना चाहिए। इस प्रकार, दिन-रात ‘माँ’ का ही चिन्तन करे और उसी में लीन रहे। तब लक्ष्य तक पहुंचने में कोई विलम्ब नहीं होगा और न ही कोई बाधा आएगी।

धन-सम्पत्ति या विभिन्न वस्तुओं का आवश्यकता से अधिक संग्रह भी पतन का मार्ग है। अतः साधक को सतत सजग रहना होगा कि उसके जीवन में संग्रह की यह प्रवृत्ति तो कहीं विकसित नहीं हो रही है? यदि ऐसा हो रहा है, तो उसे इस प्रवृत्ति को विराम देना होगा।

मानवता की सेवा, धर्मरक्षा और राष्ट्ररक्षा के लिए परम पूज्य सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के द्वारा गठित क्रमशः भगवती मानव कल्याण संगठन, पंचज्येाति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम और भारतीय शक्ति चेतना पार्टी की त्रिधारा समाज को प्रदान की गई है। प्रत्येक साधक का कर्तव्य है कि वह इन तीनों धाराओं के प्रति तन-मन-धन से पूर्ण समर्पित रहे। अतः यह भी निरन्तर आत्मावलोकन करते रहना होगा कि उसके समर्पण में कहीं कोई कमी तो नहीं आ रही है?

हर व्यक्ति की आय के दशांश पर उसका स्वयं का कोई अधिकार नहीं होता। उस पर तो मात्र प्रकृतिसत्ता या गुरु का ही अधिकार होता है, क्योंकि उन्हीं की कृपा से उसे वह प्राप्त हुई है। अतः यदि कोई अपनी आय के दशांश को अपने या अपने परिवार के लिए खर्च करता है, तो यह उसके लिए विष के समान है और उसका पतन अवश्यम्भावी है। इसलिए, यदि उसे साधनापथ पर बढ़ना है, तो बड़ी ईमानदारी के साथ उसे अपनी आय का दशांश नियमित रूप से अपने धर्मस्थल के प्रति समर्पित करते रहना होगा, जहां से वह जुड़ा है। उत्तम तो यह होगा कि इस दशांश का आधा धर्मस्थल को और शेष आधा अपने आसपास किसी गोशाला को गोपालन, गोसंरक्षण एवं गोसंवर्द्धन के लिए या मानवसेवा के कार्यों में समर्पित किया जाय।

इस प्रकार, हम देखते हैं कि एक साधक को आंख मूंदकर मात्र साधना ही करते नहीं जाना है, बल्कि, पग-पग पर उसे यम-नियमों के पालन के प्रति लगातार सजग एवं सावधान भी रहना है। इससे उसकी साधना निर्विघ्न रूप से चलेगी और वह लगातार उत्थान की ओर जाते हुए प्रकृतिस्वरूपा माता आदिशक्ति जगज्जननी जगदम्बा से एकाकार हो जाएगा, जो मानवजीवन का चरम लक्ष्य है।


No comments

Theme images by Veni. Powered by Blogger.