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• मरने की कला Death celebration

Death celebration
Death celebration


मरने की कला

इस संसार में सही ढंग से जीना एक कला है। हमारा जीवन पूर्णतया व्यवस्थित हो तथा बिना किसी तनाव के सुचारु रूप से चलता रहे। जो भी हम करें, उसमें सफलता मिले और किसी से किसी प्रकार का कोई टकराव न हो। जहां भी हम रहें, वहां पर चारों ओर आनन्द का वातावरण बना रहे तथा अन्त में हम अपने जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त कर लें, तो हमारा जीवन सफल हो जाता है। ऐसा जीने की कला के समुचित ज्ञान के बिना सम्भव नहीं है।
इसी प्रकार, मरने की भी एक कला है। यदि इसका सही ज्ञान हो, तो मरना भी सफल हो जाता है। इसके समुचित ज्ञान के अभाव में प्रायः मनुष्य मृत्यु से डरता रहता है और जब उसका कोई आत्मीयजन मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, तो सिर पीट-पीटकर विलाप करता है।

मृत्यु क्या है ?

सामान्य भाषा में जीवन का अभाव ही मृत्यु है। आयुर्विज्ञान के अनुसार मृत्यु, शरीर की वह स्थिति है जिसमें उसकी समस्त क्रियायें ठीक उसी प्रकार बन्द हो जाती हैं, जिस प्रकार कोई मशीन खराबी आने पर चलते-चलते बन्द हो जाती है। आत्मा को विज्ञान ने अभी तक मान्यता नहीं दी है।
अध्यात्म की दृष्टि से, स्थूल शरीर में आत्मा विद्यमान है। उसी के द्वारा यह संचालित होता है। जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है, तब वह कार्य करना बन्द कर देता है और सड़ने-गलने लगता है। यही मृत्यु है।
जन्म और मृत्यु, दोनों जुड़वां भाई-बहन हैं। बच्चे के जन्म के साथ ही उसकी मृत्यु का भी जन्म हो जाता है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। आधुनिक आयुर्विज्ञान के अनुसार, शरीर की विभिन्न कोशिकायें क्षण-प्रतिक्षण लगातार मरती रहती हैं और नई कोशिकायें उनका स्थान लेती रहती हैं। इस तरह, कुछ समय के बाद सारा शरीर ही बदल जाता है। किन्तु, आत्मा वही की वही बनी रहती है। उदाहरणार्थ, मोहन के बचपन का फोटो, यदि किसी ऐसे व्यक्ति को दिखाया जाय, जिसका सम्पर्क उससे बूढ़ा होने पर ही हुआ हो, तो वह यही कहेगा कि यह फोटो मोहन का नहीं है। बूढ़ा होने तक मोहन का शरीर असंख्य बार बदल चुका है, परन्तु उसकी आत्मा वही है, जो उसके पैदा होने के समय थी। वह बूढ़ी नहीं होती। यह एक अलग बात है कि उसके ज्ञान-अज्ञान एवं उसके द्वारा किये गये सत्कर्मों-दुष्कर्मों के अनुसार उसकी आत्मा का स्तर ऊंचा-नीचा होता रहता है।

मृत्यु भी एक उत्सव

गहराई से देखें तो जन्मदिवस, वास्तव में मृत्युदिवस भी है। उनतीसवें जन्मदिवस का मतलब है कि उनतीस वर्ष तक जीने के साथ हम, इतना ही समय मर भी चुके हैं। अतः अपने जन्मदिन पर हमें विचार करना चाहिये कि क्या इन उनतीस वर्षों को और बेहतर तरीके से नहीं जिया जा सकता था? साथ ही, यह भी कि जीवन के जो वर्ष शेष बचे हैं, उनमें हमें कैसा जीवन जीना चाहिये।
शिशु के जन्म पर परिवार में खुशियाँ छा जाती हैं। जिस प्रकार जन्म एक उत्सव है, उसी प्रकार मृत्यु भी एक उत्सव ही होना चाहिये, क्योंकि वहां से एक नये जीवन की शुरूआत होती है। यही कारण है कि ज्ञानी पुरुषों की अन्तिम यात्रा के समय कोई भी रुदन नहीं करता। उस समय भजन-कीर्तन होते हैं और शंख-घण्टे-घड़ियाल आदि बजाये जाते हैं। यथार्थ में, मृत्यु प्रकृति का एक मंगलमय विधान है। यहां पर यदि कोई भी न मरता, तो धरती पर तिल धरने को जगह न बचती।
वैसे, सामान्यतया अपने किसी आत्मीयजन की मृत्यु पर दुःख होना स्वाभाविक है, जो अज्ञानवश होता ही है। फिर भी, इस समय रोना-बिलखना नहीं चाहिये, क्योंकि इससे दिवंगत आत्मा को कष्ट होता है और परलोक में वह अशान्त रहती है। मृत्यु के समय दिवंगत आत्मा को अश्रुपूरित आंखों से ठीक उसी प्रकार विदाई देनी चाहिये, जिस तरह एक मां अपनी बिटिया को उसके विवाह के समय विदा करती है।

मृत्यु से डरें नहीं 

जैसा कि हम जानते हैं, जिस क्षण शिशु उत्पन्न होता है, तभी से उसका भौतिक शरीर मरना शुरू हो जाता है। हर दिन गुजरने के साथ मृत्यु उसके समीप ही रहती है। इसे ऐसा समझना चाहिये कि यहां पर हम वापसी का टिकट (रिटर्न टिकट) लेकर आये हैं, जिस पर हमारी वापसी की तारीख छपी है, भले ही हम उसे पढ़ न सकें। जब यह बात समझ में आ जायेगी, तो हम मौत से डरेंगे नहीं, बल्कि मुस्कुराकर उसका स्वागत करेंगे। जन्म की तरह मृत्यु भी एक प्राकृतिक घटना है।
मृत्यु तो एक अच्छी मित्र है। वह एक थके, बीमार एवं जर्जर शरीर को दुःख से मुक्ति दिलाने आती है। एक ऐसा शरीर, जिसमें काम करने की शक्ति न रह गई हो, जिसके अंगों ने काम करना बन्द कर दिया हो और उनमें दर्द रहने लगा हो, जो शरीर मानवता की सेवा में कोई योगदान नहीं कर सकता हो, बल्कि उल्टे स्वयं उसे ही किसी दूसरे से सेवा पाने की दरकार रहती हो, वह शरीर आत्मा के लिये जेल से बढ़कर कुछ भी नहीं है। ऐसी स्थिति में, मृत्यु हमारी मित्र ही तो है, जो हमें दुःख से छुटकारा दिलाने आती है।
मृत्यु को किसी प्रकार का कोई गोपनीय रहस्य बनाकर नहीं रखना चाहिये। इस पर बड़े सुन्दर ढंग से खुले में चर्चा करनी चाहिये। जिस प्रकार हम बच्चों को पाप-पुण्य के बारे में तथा अच्छे आचरण एवं व्यवहार की शिक्षा देते हैं, ठीक उसी प्रकार उन्हें मृत्यु से निर्भय होने की भी शिक्षा देनी चाहिये।

स्वागत की तैयारी 

मरणोपरान्त जीवन एक विवादास्पद विषय हो सकता है। किन्तु, मृत्यु एक ऐसा विषय है, जो पूर्णतया निर्विवाद है। यहां पर सभी धर्म एकमत हैं- जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। यह प्रकृति का अटल नियम है। साथ ही यह भी सब जानते हैं कि मृत्यु जितना निश्चित है, उतना ही जीवन अनिश्चित है। कौन जाने, कब सांस बन्द हो जाय! इसलिये, मृत्यु के स्वागत के लिये हमें हर पल तैयार रहना चाहिये।
यहां पर हमें लगातार मान-मर्यादा, ईमानदारी, सच्चाई-भलाई, सेवा, प्रेम, करुणा एवं क्षमाशीलता का उमंगपूर्ण सकारात्मक जीवन जीना चाहिये। माया-मोह में जितना लिप्त रहेंगे, मृत्यु के समय उतना ही कष्ट होगा और खिंच-खिंचकर प्राण निकलेंगे। जो लोग निर्लिप्त एवं असंग जीवन जीते हैं, वे शान्तिपूर्वक प्राण त्यागते हैं।

सर्वश्रेष्ठ तैयारी

परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज का रोम-रोम जनकल्याण के लिये समर्पित है। भगवती मानव कल्याण संगठन का गठन उन्होंने इसी उद्देश्य को लेकर किया है। इस संगठन से जुड़कर कोई व्यक्ति यदि श्री गुरुदेव के जनकल्याणकारी कार्यों में सहयोगी बन जाय, तो इस दुनिया से जाने की यह सर्वश्रेष्ठ तैयारी होगी। इसके लिये आश्रम में आकर स्थायी रूप से रहना बिल्कुल भी जरूरी नहीं है। अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुये भी कोई व्यक्ति अपने घर पर रहकर संगठन के कार्यों में भरपूर योगदान कर सकता है। बस, आवश्यकता है केवल सेवा, साधना और समर्पण की भावना की। इतिहास साक्षी है कि जिस व्यक्ति ने अपना जीवन पूर्णरूप से समाजकल्याण के लिये समर्पित कर दिया, निश्चित ही उसका मरना एक उत्सव हो गया।
आज की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जीवन का स्तर ऊंचा उठाने की अन्धी दौड़ में आधुनिक मनुष्य उल्टे-सीधे काम करके आवश्यकता से अधिक धन एकत्र कर रहा है। इस सम्बन्ध में श्री गुरुदेव का कहना है कि जरूरत से ज्यादा धना इकट्ठा करके अपने जीवन में अशान्ति मत बढ़ाओ। ज्यादा से ज्यादा आने वाली एक पीढ़ी के लिये इकट्ठा कर लो, उसके बाद तो गरीबों को लुटाओ। बड़ी शान्ति मिलेगी। काश, जनसामान्य की समझ में यह बात आ सके। यदि ऐसा हो जाय, तो सब लोग मृत्यु को हंसकर गले लगाएंगे। मरने की कला का दर्शन निम्नवत् एक दोहे में भली-भांति सन्निहित है, जो विचारणीय एवं करणीय हैः

आये जब संसार में, जग हंसा तुम रोय।
ऐसी करनी कर चलो, तुम हंसो जग रोय।।


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