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आज के युग में भी जरूरी है ’’गौ माता की सेवा’’(Need to service of Gomata)

Need to service of Gomata
आज के युग में भी जरूरी है ’’गौ माता की सेवा’’

आज के युग में भी जरूरी है 

’’गौ माता की सेवा’’ (Need to service of Gomata)

या देवी सर्वभूतेषु गौ माता रूपेण संस्थितः।
नमस्तस्यै! नमस्तस्यै! नमस्तस्यै नमो नमः।।
आज इस कलियुग में घोर अत्याचार हो रहा हैं। जहां एक ओर भाई-भाई को मार रहा हैं, बाप बेटा का रिश्ता खत्म हो रहा है वही दूसरी ओर मनुष्य इतना स्वार्थी हो गया है कि पशुओं को भी नहीं छोड़ रहा हैं। यहां तक कि ’’गौ’’ जिसे हम कभी गौमाता के नाम से पूजते थे आज उसी को कुछ पैसो की खातिर उसके बृद्धावस्था में वध हेतु कसाई को बेंच देते हैं। जबकि बेदों पुराणों में भी गौ माता की महिमा गाई गई है। गौमाता को समस्त रिद्धि सिद्धि प्रदान करने वाली कामधेनु से सम्बोधित किया गया है स्वयं वेद गाय को नमन करता हैं।

अध्न्ये! ते रूपाय नमः।
रूपायाध्न्ये ते नमः।।
  (अथर्व शौन 10/10/1 पेम्प 16/107/1)
ळे अवध्य गौ तेरे स्वरूप के लिए प्रणाम है। देवी के नामो मे भी ’’गौमाता’’ का उल्लेख हुआ है, गौ न केवल अदृष्ट रूप सौभाग्य संवर्धन कारिणी होने के कारण पूज्यनीय है। प्रत्युत उसके द्वारा प्रत्यक्ष भी हमारे महाकार्य सम्पन्न होते हैं जैसे कि हम किसी भी देवी देवता की पूजा में प्रसाद स्वरूप गाय का दूध, दही, घी आदि उपयोग करते हैं, अन्य किसी दूसरे पशु का नहीं। यज्ञ के समय भी देवताओं को आहुति हेतु गौ माता के ही प्रायः दुग्ध, दही, घृत आदि गव्य पदार्थों का उपयोग होता है।

गौ माता का घी, दूध गोमय तथा गोमूत्र को शास्त्रों कि विधि से तैयार कर सेवन किया जाय तो वह सभी प्रकार के पापो को नष्ट करने वाला है शास्त्रों मे कहा गया है कि-

यत्वगरिस्थगतं पापं देहे तिष्ठति मामके।
प्राशनात पञचबव्यस्य दहत्वग्रिरिवेन्धनम्।।
जे मेरे शरीर की रक्त मांस हड्यिों में पाप प्रविष्ठ हो गया है, वह सब यह पञनगव्य पाप करने से उसी प्रकार नष्ट हो जाय जैसे अग्नि सूखी लकड़ियों को जलाकर भष्म कर देती है। ’पुराणों मे भी गौमाता की महिमा गाई गई है; नदियों को गौ के शरीर में स्थित बताया गया है।

’’ब्रहत्पराशस्मृति’’ (5/34/41) में कहा गया है कि गोमाता के सींग के मूल मे ब्रम्हा जी, दोनो सींग के मध्य भगवान नारायण और दोनों सींग के शिरों भाग में भगवान शंकर, इस प्रकार ये तीनो देवता गौमाता के सींग में प्रतिष्ठित हैं। इसके अतिरिक्त सींग के अग्रभाग में सभी ताीर्थ विद्यमान हैं। गौमाता के ललाट के अग्रभाग में देवी पार्वती तथा नाक के मध्य में कुमार कार्तिकेय का निवास हैं दोनों कानों में कम्बल और अश्वतर नाम के दो नाग निवास करते हैं, दाहिनी आँख में सूर्य और बाँयी आँख में चन्द्रमा का निवास है। दाँतों मं आठों वसु और जिहृा में भगवान वरूण प्रतिष्ठित हैं। गौ के हुंकार में देवी सरस्वती निवास करती है और गालों में यम और यक्ष निवास करते हैं, गौमाता सभी रोम कूपों में ऋषि गण निवास करते हैं तथा गौमूत्र में माता गग्डा का पवित्र जल निवास करता है और गोमय में माता यमुना तथा सभी देवता प्रतिष्ठित है। अट्ठाइस करोड़ देवता उसके रोमकूपों में स्थित हैं, गौमाता के उदर प्रदेश में गार्ह पत्य अग्नि का निवास है और हृदय में दक्षिणाग्नि का निवास है, मुख में आहवनीय नाम की अग्नि तथा कुच्छियों में सभ्य एवं आवसभ्य नामक अग्नियां निवास करती है। इसी प्रकार गौमाता के शरीर में सभी देवताओं को स्थित समझकर जो कभी उसके ऊपर क्रोध तथा प्रताड़ना नहीं करता है। वह महान ऐश्वर्य को प्राप्त करता है और मोक्ष को प्राप्त कर स्वर्गलोक को जाता है।

पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड 57/156-164 में तथा भविष्य पुराण के उत्तर पर्व 69/25-37 में, ब्रम्हाण्ड पुराण, स्कन्दपुरराण के आवन्त्य खण्ड, रेखाखण्ड अ 83 में, महाभारत के आश्वमेधिक पर्व, वैष्णव धर्म पर्व, अध्याय 92 आदि में गौ माता के शरीर में स्थित देवी, देवता, समुद्र, नदियां, पहाड़, अग्नि आदि के प्रतिष्ठा होने का विसरण मिलता है।

श्रीमद् भगवत में भी गौ की महिमा गाई गई है।
यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु।
धर्मेमयि च विद्वेषः सव आशु विनश्यति।।
                                             (7/4/27)
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
कोई भी प्राणी जब देवता, बेद ब्राम्हण, साधु, धर्म एवं मुझसे द्वेष करने लगता है तब शाीध्र ही उसका विनाश हो जाता है। यह सार्वकालिक दैवीय विधान है। पृथ्वी और गाय अभिन्न हैं। जब जब पृथ्वी दुष्टों के भार से पीड़ित हुई है तब-तब वह गौमाता का रूप धारण करके ही श्री भगवान को अपनी दुःख गाथा सुनाती है। एक जगह और देखिये क्या भाव है-
तौ वत्स पालकौ भूत्वा सर्वलोकैक पालकौ।
सप्रातराशौ गोवत्सांश्चारयन्तौ विचेरतुः।।  
                                      (10/11/45)
समस्त लोको के पालन कर्ता श्री कृष्ण जी और बलराम जी अब बछडे के चरवाहे बने हुये हैं। तड़के ही कलेवे की सामग्री लेकर बछड़ो को चराते हुये वे वन-वन घूमते हैं स्मरणीय है कि श्री कृष्ण बलराम नंगे पैर ही गायें चराने जाया करते थे। नन्द यशोदा द्वारा उपानह (जूते) धारण करने के सारे अग्राह उन्होने अस्वीकार कर दिये, कारण उनके प्रिय बछडे भी तो बिना पद ़त्राण ही विचरतें हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि गायों में कामधेनु मैं हूँ, इसी से आप कल्पना करिये कि एक युग पुरूष जिन्हे विश्वं वन्दे जगद्गुरु की उपाधि से ऋषियों ने विभूषित किया हो वे ही जब गौमाता की सेवा इतनी तल्लीना से करते हैं तो गौसेवा का कितना बड़ा महत्व व फल होगा इसकी तो कल्पना करना ही हम लोगो के परे की बात है। चारों वेदों ने एक स्वर से गौवों की महिमा का गुणानुवाद किया हैै। वेदों में वर्णित गौ माता सम्बन्धी मंत्रो को अगर उद्धत करके विचार किया जाय तो एक वृहद ग्रन्थ तैयार हो जायेगा यही स्थितियाँ पुराणों एवं स्मृतियों में है। सब में गौमाता की महिमा की प्रशंसा में वाक्यों का भंडार भरा पडा़ है। इसी से आप समझ सकते है कि आज श्री गौमाता की सेवा हमारे जीवन में क्यों आवश्यक है।
योगीराज भगवान श्री कृष्ण के विषय में भी विचित्र-विचित्र आख्यान कहे जाते हैं। जो उनके गोपाल नाम को चरितार्थ करते हैं, बचपन में गायें चराना, गायों के सताने वाले को मार डालना, ब्रम्हदेव का मान मर्दन करना, गोवर्धन धारण कर गोरक्षा करना इत्यादि अनेक कथायें सविस्तार हमारे पुराणों में वर्णित हैं। नटवर का सारा ज्ञानकोष ही गौ माता के चरण से प्राप्त हुआ जिससे आगे चलकर संसार का उद्धार करने वाली गीता का ज्ञान निकला। एक जगह भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है कि मैं तुम्हे अपने धाम अर्थात गोलोक धाम भेज रहा हूँ जहाँ से प्राणी कभी वापस नहीं आता हैं। अर्थात मोक्ष को प्राप्त करता है-

’’गोत्र शब्द गौ से बना है जो हिन्दुओं के विभिन्न वंशों के परिचय के लिए इसका उपयोग करते हैं, पूजा की माला मंत्र जप करत समय गौमुख (कपड़े की थैली) में रखकर ही मंत्र जाप करते हैं, माता गंगा के उद्गम स्थल को भी गौमुख ही कहते हैं। ऋषिगण झुंड की झुंड गौएं रखते थे, यही इस ’शब्द’ के व्यवहार का मूल है। उस समय लडकियों का प्रधान कार्य गौ सेवा था इसलिए वे दुहिता कहलाती थी। एक दंतकथा प्रचलित है कहते हैं कि एक दिन भगवान शंकर ब्रम्ह देव के घर गये। पितामाह ने उनका बडा आदर सत्कार किया एवं विदाई के समय प्रसन्न होकर सृजनकर्ता ने बहुत सी गायें भेंट स्वरूप् दी जिनके आगे स्वर्ण की संपदा भी तुच्छ थी। उन्हे पाकर संहार कर्ता भगवान शंकर बड़े प्रसन्न हुये, तभी से उनका नम ’पशुपति’ पड़ा। महादेव ने अन्य शीघ्रगामी सवारियों का त्याग कर अपनी सवारी के लिए नन्दी नामक बैल का वरण किया।

जब-जब पृथ्वी पर घोर अन्याय एवं पाप का साम्राज्य होने लगता है, अनीति अत्य हद से ज्यादा बढ जाता है, तब तब मााता पृथ्वी गौमाता का रूप धारण कर ब्रम्हदेव की शरण में आया करती हैं और पितामह उसका दुःख दूर किया करते हैं। इसलिये मिलता जुलता आख्यान पारसी जाति के इतिहास में भी पाया जाता है। राक्षस राज रावण भी नियमित रूप से प्रतिदिन गायों की प्रदक्षिणा किया करता था।

गुरूनानक जी बचपन में गायें चराते थे एक दिन जेछ की दुपहरी में गायों को समेटकर वे एक घने वृक्ष के नीचे सो गये। उधन से निकलने वाले राहगीर ने देखा कि एक विषधन सर्प फन निकाले नानक के मस्तक के पास बैठा है। उसने ढेला मारकर नानक को जगाया उनके उठते ही सांप जंगल में चला गया, कहते है कि उसी समय से नानक जी ध्यान मग्न हो गये और आगे चलकर वे शाक्तिशाली सिख सम्प्रदाय के संस्थापक बने।

त वां वास्तून्यश्मसि गमध्मैं,
यत्र गावो भूरिशृडग अयासः।
अत्राह तदुरूगायस्य वृष्णः, 
परम पदमव भाति भूरि।।
             (ऋग्वेद 1/154/6)
’’गौभक्तगण अश्विनीकुमार से प्रार्थना करते हैं कि-हे अश्विनी कुमार! आपके इस गोलोक रूप निवासस्थान में जाना चाहते हैं, जहां बडी़-बड़ी सींगवाली सर्वत्र विचरण करने वाली गौएं निवास करती हैं। वहीं पर सर्वव्यापक विष्णु भगवान का परम पर वैकुण्ठ धाम स्थापित है।’’

मता रूद्राणां दुहिता वसुनां।
स्वसादित्यानाममृतत्स नाभिः।।
                 (ऋग्वेद 8/101/15)
गौ एकादश रूद्रों की माता, अष्ट वसुओ की कन्या और द्वादश आदित्यों की बहन है, जी है, जो कि अमृत रूप दुग्ध को देने वाली है।

क्षुमन्तं बाजूँ सहस्त्रिणं मक्षु गोमन्तीमहे। (समवेद,उत्तरार्चिक 1/3)
’हम पुत्र पौत्रादि सहित सैकडों हजारों की सख्या वाले धनों की और गौ आदि से युक्त अन्न की शीघ्र याचना करते हैं।’
यूयं गावो मेदयथा कृशं चिदश्रीरं,
चित्कृणुथा सुप्रतीकम्।।
भद्रं ग्रहं कृणथ भद्रवाचो।
बृहद्वोवय उच्यते सभासु।।
              (अर्थवेद 4/21/6)
हे गौ माता! तुम अपने दुग्ध घृतादि द्वारा दुर्बल मनुष्यों को हष्ट पुष्ट करती हो और निस्तेजों को तेजस्वी बनाती हो। तुम अपने मग्डलमय बनाती हो इसलिए सभाओं में तुम्हारी कीर्ति का वर्णन होता रहता हैं

गावः पवित्रा माग्डल्य गोषु लोकाः प्रतिष्ठिताः। 
                                   (अग्निपुराण 292/1)
’गौएं पवित्र और मग्डलादायिनी हैं। गौओं में समस्त लोक प्रतिष्ठित हैं।’

गवों बन्धुर्मनव्याणां मनुष्या बान्धवा गवाम्।
गौश्चयस्मिन गृहे नास्ति तद् बन्धुरहितं गृहम्।।
                           (पद्य. सृष्टि 50/155-156)
गौएं मनुष्य की बन्धु हैं और मनुष्य गौओं के बन्धु हैं। जिस घर में गौ नहीं है वह घर बन्धु शुन्य है।

गा च स्पृशति यो नित्य स्त्रातो भवति नित्यशः।
अतो मर्त्यः प्रपुष्टैस्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते।।
गवां रजः खुरोद्वूतं शिराना यस्तु धारतेय।
स च तीर्थ जले स्त्रातः सर्वपापैः प्रमुच्यते।।
                       (पद्य. सृष्टि 50/165-166)
जे मनुष्य प्रतिदिन गौमाता का स्पर्श करता हो वह प्रतिदिन तीर्थजल के स्नान करने का फल प्राप्त करता है। गौमाता के द्वारा मनुष्य सर्वविधि घोर पापों से मुक्त हो जाता है, जो मनुष्य गौ के खुर से उडी हुई धुल को अपने मस्तक पर धारण करता हो, वह समस्त तीर्थो के जल में स्नान करने का फल प्राप्त करता है और समस्त पापों से छुटकारा पा जाता है।
                                                                               बृजपाल सिंह चौहान (गुरु सेवक)

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